section 144

basic details about it

What is the opinion / advise of your tutor ?

It is advisable to consult and engage a local prudent lawyer for better appreciation of facts/ circumstances/ documents, professional guidance and necessary proceeding if there is some truth in your question.


Section 144, CrPC enables government to issue order in urgent cases of nuisance of apprehended danger. It is imposed in urgent cases of nuisance or apprehended danger of some event that has the potential to cause trouble/damage to human life or property. It prohibits public gathering. It also restricts carrying any sort of weapon in that area where it has been imposed and people can be detained for violating it. The maximum punishment for such an act is 3 years. Under this section, there shall be no movement of public and all educational institutions shall also remain closed and there will be a complete bar on holding any kind of public meetings or rallies during the period of operation of this order. It also empowers the authorities to block the internet access. No order under this section shall remain in force for more than 2 months. However, the state government has the jurisdiction to extent the validity for 2 and maximum up to 6 months. It can be withdrawn at any point of time, if situation becomes normal.

Considering the current scenario, this section has been imposed in order to protect citizens from novel COVID-19 as it's the need of hour.


Thank you for your question

Section 144 CrPC 1973- Power to issue order in urgent cases of nuisance of apprehended danger.

This section under Crpc talks about the Prohibited order, here executive Magistrate having the power to prohibit those things which is danger for Public Peace and tranquility or riot,or any such activity which disturb the law and order.

Who can proclaim order under this section

1. District Magistrate,

2. Sub-divisional Magistrate or

3. Any other Executive Magistrate specially empowered by the state Government in this behalf,

Section 144(3) CrPC

An order under this section may be directed to a particular individual, or to persons residing in a particular or area, or to the public generally when frequenting or visiting a particular place or area.

Section 144(4)CrPC

No order under this se tion shall remain in force for more than 2 months from the making thereof:

Important provsions:

Provided that, if the State Government considers it necesary so to do so for preventing danger to human life, health or safety or for preventing a riot or any affray,

It may, by notification , direct that an order made by a Magistrate under this section shall remain in force for such further period not exceeding 6 months from the date on which the order made by the Magistrate would have.

Hope this will help you

Best regards,

Akshay Gupta





Section 144 of the Criminal Procedure Code (CrPC) of 1973 authorises the Executive Magistrate of any state or territory to issue an order to prohibit the assembly of four or more people in an area. According to the law, every member of such 'unlawful assembly' can be booked for engaging in rioting.


Section 144 of CrPC generally prohibits public gathering. And on the other hand, curfew, orders people to stay indoors for a specific time. Therefore, the officials can impose curfew for a certain time. ... However, the authorities can extend the period of curfew if required


 Covid-19 rising all over the world and India is not left behind. On 24 March 2020, in India cases of COVID-19 rises 492 and 9 deaths are reported. Therefore, to counter the situation Section 144 of the CrPC is imposed in several districts of the states including Maharashtra, Rajasthan, Andhra Pradesh, Tamil Nadu, etc. Let us have a look in detail about Section 144 of the CrPC.    

Section 144 of Criminal Procedure Code (CrPC) imposes power to executive magistrate to restrict particular or a group of persons residing in a particular area while visiting a certain place or area. This is the need in our time of COVID-19 crisis.


The outbreak of novel coronavirus aka COVID-19 was the reason for such threat to human life perceived by the Magistrate. This order created confusion among the general public who assumed this to be an imposition of Section 144 of Indian Penal Code (IPC) pertaining to Unlawful Assembly.


The same was later clarified by the Mumbai Police that the order was specific in nature, applicable to ‘Tour Operators’ and not the public in general. This was done so that travel groups comprising domestic or foreign nationals in the area may be curtailed. The question that now lingers around is whether the imposition of Section 144 is the need of the hour amid this crisis.


We must know that Section 144 is there to dispose of urgent cases of nuisance or apprehended danger by a competent magistrate so empowered to take such action. Although in India the number of reported cases is still low compared to other nations across the globe, one cannot ignore the harm already caused by the coronavirus due to its quick growth rate and the potential to further aggravate the situation.


*************** *LEGAL UPDATE* ****************************** BY ARSHAD ALI ZAIDI ADVOCATE, DISTRICT AND SESSION COURT SAHARANPUR, MOB.- +91-9719775005 📕 *दंड प्रक्रिया सहिंता 1973 की धारा 144*
📜अधिकतर सुनाने में आने वाली धारा 144 क्या है ये जानना सब लोग चाहते है
अक्सर हम सभी सुनते या पढ़ते हैं कि पुलिस ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए धारा-144 लगा दी है. कहीं भी किसी भी शहर में हालात बिगड़ने की संभावना या किसी घटना के बाद धारा-144 लगा दी जाती है. आईए जानते हैं कि आखिर धारा-144 है क्या और इसका पालन न करने पर क्या सजा हो सकती है।
📖धारा 144 निषेधाज्ञा है। प्रशासन को या प्रशासनिक अधिकारी जिनके पास कार्यपालिका के अधिकार है ( यहाँ ये बताना जरुरी है की मजिस्ट्रेट दो प्रकार के होते है कार्यपालक मजिस्ट्रेट (executive magistrate) और न्यायिक मजिस्ट्रेट ( judical magistrate) ) को ये जिम्मेदारी दी गई है की वो आवश्यकता के अनुसार निषेधाज्ञा जारी कर सकता है।
📖 धारा 144 शांति व्यवस्था कायम करने के लिए लगाई जाती है। इस धारा को लागू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट यानी जिलाधिकारी एक नोटिफिकेशन जारी करता है। और जिस जगह भी यह धारा लगाई जाती है, वहां चार या उससे ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते हैं। इस धारा को लागू किए जाने के बाद उस स्थान पर हथियारों के लाने ले जाने पर भी रोक लगा दी जाती है।
📖धारा 144 का उदघोष करने के लिए कौन कौन प्राधिकृत है. 📖 DM यानि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट जिसे जिला दण्डा अधिकारी या जिलाधीश भी कहते है , जिला में एक ही डीएम होता है
Sub Divisonal Magistrate यानि उप प्रभागीय मजिस्ट्रेट
या ऐसा कोई अन्य कार्यपालिका अधिकारी जिन्हे प्राधिकृत किया गया हो जैसे नायब तहसीलदार या तहसीलदार. 📖 144 को निषिद्ध किया जाता है किसी स्थिति को पैदा होने से पहले रोकने के लिए। जिसमे दंगा या बलवा होने की सम्भावना हो या लोक शांति प्रभावित होती हो या लोक बाधा उत्त्पन होने की संभावना हो।
📖 धारा 144 एक पक्षीय हो सकता है ये दो माह के लिए ही हो सकती है राज्य सरकार केवल खास हालातों में इसे जारी करने की तारीख से छह माह तक ही बड़ा सकती है. 📖 धारा 144 में गोली नहीं चलाई जा सकती।
*कब तक लग सकती है धारा-144* 📖 धारा-144 को 2 महीने से ज्यादा समय तक नहीं लगाया जा सकता है। अगर राज्य सरकार को लगता है कि इंसानी जीवन को खतरा टालने या फिर किसी दंगे को टालने के लिए इसकी जरूरत है तो इसकी अवधि को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इस स्थिति में भी धारा-144 लगने की शुरुआती तारीख से छह महीने से ज्यादा समय तक इसे नहीं लगाया जा सकता है।
*क्या है सजा का प्रावधान धारा- 144* 📖 धारा-144 का उल्लंघन करने वाले या इस धारा का पालन नहीं करने वाले व्यक्ति को पुलिस गिरफ्तार कर सकती है. उस व्यक्ति की गिरफ्तारी धारा-107 या फिर धारा-151 के तहत की जा सकती है. इस धारा का उल्लंघन करने वाले या पालन नहीं करने के आरोपी को एक साल कैद की सजा भी हो सकती है. वैसे यह एक जमानती अपराध है, इसमें जमानत हो जाती है.
📖धारा-144 और कर्फ्यू के बीच फर्क
ध्यान रहे कि सेक्शन 144 और कर्फ्यू एक चीज नहीं है। कर्फ्यू बहुत ही खराब हालत में लगाया जाता है। उस स्थिति में लोगों को एक खास समय या अवधि तक अपने घरों के अंदर रहने का निर्देश दिया जाता है। मार्केट, स्कूल, कॉलेज आदि को बंद करने का आदेश दिया जाता है। सिर्फ आवश्यक सेवाओं को ही चालू रखने की अनुमति दी जाती है। इस दौरान ट्रैफिक पर भी पूरी तरह से पाबंदी रहती है।
*कुछ महत्वपूर्ण केस*
📃 *प्रवीण भाई तोगड़िया vs स्टेट ऑफ़ कर्नाटक*
इसमें न्यायालय ने कहा की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट जब भी धारा १४४ को लागु करेंगे ये लोक शांति व कानून वयवस्था के लिए हो न की किसी राजनैतिक स्वार्थ को पूरा करने के लिए हो.
📃 *मौला बख्स VS राम स्वरुप शाह*
इसमें न्यायालय ने कहा की साठ दिन का समय अंतिम आदेश से नहीं बल्कि उस दिन से माना जायेगे जिस दिन इसे लागू किया गया।
📃 *स्टेट ऑफ़ बिहार Vs. के के मिश्रा*
इसमें न्यायालय ने कहा की जो अधिकार राज्य सर्कार को दिए गए है वो स्वतंत्र है और कार्यपालिका अधिकार है।
📃 *गुलाम अब्बास Vs. स्टेट ऑफ़ उत्तर प्रदेश*
इसमें न्यायालय ने कहा की धारा 144 में दिया गया आदेश प्रशासनिक होगा ये न तो न्यायिक है न अर्द्ध - न्यायिक है।
📃 *एम मोक्काराज Vs एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट*
इसमें न्यायालय ने कहा की बहुत जरुरी है की मजिस्ट्रेट ये ध्यान रखे की धारा 144 का आदेश पारित करे ये ध्यान रखे की इसकी वास्तविकता में जरुरी था यदि बाद में पता चले की ये वास्तव में जरुरी नहीं था तो ये आदेश अमान्य होगा।
📃 *जिला परिषद् इटावा vs. के. सी. सक्सेना*
इसमें न्यायालय ने कहा की जब कभी 144 का आदेश पारित किया जायेगा इसका सार लिखा जाना जरुरी है कोई साक्ष्य लिया जाना जरुरी नहीं है बस इस बात का ध्यान रखा जाये की जब ऐसा निषेध आदेश दिया जाये तो पहले ये देखा जाना चाहिए की तुरंत निषेध आदेश पास करना आवश्यक है।
📃 *मनोहर जी. जोशी vs एस. बी. कुलकर्णी*
इसमें न्यायालय ने कहा की अगर एक पक्षीय आदेश पारित कर दिया गया है और ये भी तथ्य नहीं है की ये आदेश पारित करना जरुरी था पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने निर्धारित पर्याप्त समय भी नहीं दिया तो ये आदेश अमान्य होगा।
📃 *रविंद्र नाथ सिंह vs स्टेट ऑफ़ बिहार*
इसमें न्यायालय ने कहा है की जो अधिकार कार्यपालक मजिस्ट्रेट को दिए गए है धारा 144 के अंतर्गत उसका उपयोग करके सिविल मामलो में इस्तेमाल नहीं कर सकते सिविल मामले सिविल न्यायालय में जायेंगे।
📃 *जयंतीलाल मोहनलाल vs एरिक रेनिसों*
इस मामले में न्यायालय ने कहा है की ऐसा कोई आदेश जिसमे कर्फूय के दौरान कोई बाहर निकलते है तो उसे गोली मार दी जाये धारा 144 के अंतर्गत नहीं दिया जा सकता।
📃 *महेंद्र प्रशाद vs स्टेट*
इसमें न्यायालय ने कह की अगर कोई व्यक्ति धारा 144 के आदेश का उलंघन करता है तो वो कार्यपालक मजिस्ट्रेट उसका संज्ञान नहीं ले सकता जिसने उसकी उद्घोषणा की हो। वो इसकी शिकायत धारा 195 (1 ) (अ) के तहत कर सकता है।
📃 *बिजय कुमार डालमिया vs सांवरमल जलाल*
इस मामले में न्यायालय ने कहा की उच्च न्यायालय ऐसे किसी आदेश में दखल नहीं कर सकता जिसमे की धारा 144 में पारित किया गया आदेश समाप्त हो गया हो। उच्च न्यायालय आर्टिकल 226 का उपयोग कर दखल नहीं दे सकता न ही उसे देना चाहिए।
📃 *बंगशी दस vs अजित कुमार दास*
*इंद्रजीत vs श्री ब्रह्मपुत्र गोपीनाथ महाप्रभु*
इन मामलो में न्यायालय ने कहा की कार्यपालक मजिस्ट्रेट की कोर्ट को आपराधिक न्यायालय के अधिकार प्राप्त है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 144 के आदेश का पुनःनिरिक्षण धारा 397 के तहत उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय कर सकते है।



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