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Discussion > Constitutional Law > Constitution > Republican system in ancient India   Unanswered Threads Post New Topic

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Dr. V.N.Tripathi


Advocate and Mediator, Allahabad High Court.
[ Scorecard : 9416]
Posted On 02 October 2009 at 16:20 Report Abuse

 Dear friends,

I am impressed from the blogs of Shri V.K.S. Chaudhary, ex advocate general and senior most advocate of allahabad high court. his blogs are  worth reading for the friends who can read Hindi. Here are excerpts about democracy and republican system in ancient India : 

महाभारत के शांतिपर्व (अध्याय १०७) में गणराज्यों की विशिष्टता और लक्षणों का वर्णन है। जो किसी के अधीन न थे, न उन्हें कोई पराजित कर सका। भीष्म ने उनके गुण-दोषों की चर्चा की है। युधिष्ठिर ने पूछा, 

'गण (राज्य) कैसे फलते-फूलते हैं? आपसी फूट एवं विच्छेद से कैसे बचते हैं? मुझे लगता है, कैसे इतनी बड़ी संख्या के कारण राज्य के संकल्प गोपनीय रख पाते होंगे?'



भीष्म ने तब गणों की समृद्घि और वैभव का रहस्य समझाया। उन्होंने कहा, 


'लोभ और ईर्ष्या ही गणों के अंदर, जैसे कुल में, दुश्मनी उत्पन्न  करते हैं। यह विनाश की जड़ है। भेद एवं द्वेष गण के पतन का कारण बनते हैं। जो अच्छे गण हैं वहाँ ज्ञानवृद्घ परस्पर सुख का संचार करते हैं। उन्होंने शास्त्रों के अनुसार धर्मनिष्ठायुक्त कानून की व्यवस्था की है। वे गण उन्नति करते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने पुत्रों और भाइयों (नागरिकों) को अनुशासन सिखाया है, उन्हें प्रशिक्षित किया है। वे कहते हैं, क्योंकि उनके यहाँ सदा सम्मेलन होते रहते हैं। उनमें जो धनवान, वीर, ज्ञानी हैं और शस्त्र-शास्त्र में प्रवीण हैं, वे अपने असहाय बंधुओं की सदा सहायता करते हैं। भय, क्रोध, विभेद, परस्पर विश्वास का अभाव, अत्याचार और आपस की हिंसा होने पर ही वे शत्रु के चंगुल में फँसते हैं। इनके लिए आंतरिक संकट ही सबसे बड़ा है। उसके सामने बाह्य संकट नगण्य है। गण में सर्वव्यापी समता (सदृशता) होती है, जन्म से तथा कुल से। इस कारण गण किसी प्रकार तोड़े नहीं जा सकते, न शौर्य से या चालाकी से, न रूप के जाल से। शत्रु केवल भेद उत्पन्न कर फूट डालने से जीत सकते हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा राज्य संघों में है।'

शायद हम आज भूल गये हैं कि, 'समाज में गण की शक्ति आंतरिक समता में है।'

 


हिंदु समाज ने अपने जीवन के सर्वोदय में 'सभी सुखी हो' के सिद्घांत का गणतंत्रीय संविधान में साक्षात्कार किया था। जब कभी एक व्यक्ति के ध्वज-दंड के चारों ओर देश की आत्मा को बाँधने का प्रबंध हुआ, अंत में असफलता ही मिली। भारत की जीवन-प्रवृत्ति, उसकी प्रकृति तो विकेंद्रीकरण में थी, जिसका विकास गणराज्य के संघ में हुआ। यह गणतंत्र पद्घति संसार को भारत की देन है। अथर्ववेद का आदेश है-

'हे राजन् ! तुझको राज्य के लिए सभी प्रजाजन चुनें तथा स्वीकारें।' (तृतीय कांड, सूक्त ४, श्लोक २) 
ऎसे चुने हुए व्यक्ति को वेदों ने 'राजा' कहा। इसके विस्मरण से समाज में, देश में विकृतियाँ उत्पन्न हुयी।



Total thanks : 1 times


Dr. V.N.Tripathi


Advocate and Mediator, Allahabad High Court.
[ Scorecard : 9416]
Posted On 02 October 2009 at 16:43 Report Abuse

 Here is another blog by same author relating to same topic:

वेदों ने समिति को शाश्वत कहा है। उसे प्रजापति (ब्रम्हा) की पुत्री कहकर पुकारा। इसीलिए वह अमर है। इस समिति की छोटी बहन को 'सभा' कहा। अथर्ववेद में राज्य-प्रमुख की प्रार्थना है- 'समिति और सभा-प्रजापति की दोनों पुत्रियाँ मिलकर मेरी सहायता करें। जिनसे भी मेरी भेंट हो, मुझसे सहयोग करें। हे पितृगण ! मैं तथा यहाँ एकत्रित सभी सहमति के शब्द बोलें।'



आज हम समिति तथा सभा के पारस्परिक संबंध नहीं जानते। सभा में शायद प्रौढ़ या विशेषज्ञ (पितृगण) रहते थे। इसे 'नरिष्टा' कहा, अर्थात जिसके निर्णय का उल्लंघन नहीं किया जा सकता, न उपेक्षा। 'सभा' का शाब्दिक अर्थ है 'वह निकाय जिसके लोग आभायुक्त हों।' यह राष्ट्रीय न्यायाधिकरण (सर्वोच्च न्यायालय ) के रूप में भी कार्य करती थी।



पाणिनि ने गणराज्यों के लिए 'गण' अथवा 'संघ' दोनों शब्दों का प्रयोग किया है। 'गण' का शाब्दिक अर्थ है 'गिनना'। भगवान बुद्घ ने बौद्घ भिक्षुओं की संख्या के बारे में कहा, 

'उन्हें गिनो, जैसे गण में मत गिने जाते हैं। अथवा शलाका (मतपत्र) लेकर गिनो।' 

उस समय राज्य की सर्वोच्च सभा या संसद् को भी 'गण' कहकर पुकारने लगे। इसी से हुआ 'गणपूरक', वह व्यक्ति जिसका उत्तरदायित्स था गण की बैठक में कोरम (quorum)  पूरा करवाना और देखना। वह समिति का सचेतक भी था। इन गणों के विधान का भी विवरण जैन सूत्रों अथवा महाभारत में मिलता है। किन नियमों के द्वारा यहाँ विचार-विमर्श होता था और कैसे निर्णय लिये जाते थे। इसी प्रकार नागरिकता तथा मताधिकार के भी नियम थे।



पाणिनि ने अनेक गणराज्यों का वर्णन किया है-वृक, दामनि, त्रिगर्त्त-षट् (छह त्रिगर्त्त, अर्थात कौंडोपरथ, दांडकी, कौटकि, जालमानि, ब्राम्हगुप्त तथा जानकी का संघ), यौधेय, पर्श्व आदि। इनके अतिरिक्त मद्र, वृज्जि, राजन्य तथा अंधक-वृष्णि आदि अनेक गणराज्यों अथवा उनके संघों का नाम महाभारत में आता है। उनमें से कुछ का संविधान गणराज्यों का संघीय रूप था।



Arun Krishnan


Student
[ Scorecard : 3091]
Posted On 03 October 2009 at 01:45 Report Abuse

 This must be the blog you are referring to




Attached File (downloaded 84 times) :

Sarvesh Kumar Sharma Advocate


Advocacy
[ Scorecard : 13941]
Posted On 03 October 2009 at 07:02 Report Abuse

thanks tripathi ji.


Dr. V.N.Tripathi


Advocate and Mediator, Allahabad High Court.
[ Scorecard : 9416]
Posted On 03 October 2009 at 09:53 Report Abuse

 Yes Mr Arun, it same. I found it recently . most of his blogs are very impressive and balanced. 



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